Arya festival started at Indira Gandhi National Center for the Arts! These grand events are happening (नई दिल्ली) : मूल आर्यों के वंशज माने जाने वाले लद्दाख के दर्द आर्यों पर दिल्ली के ‘इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र’ में पहली बार प्रदर्शनी का आयोजन हो रहा है. आर्यों की संस्कृति को संजो कर रखने के लिए इन्हें पूरे विश्व में याद किया जाता है। इस मौके पर पद्दम पुरस्कार से सम्मानित नृत्यांगना ‘सोनल मानसिह’ मौजूद रहीं।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में आर्य उत्सव की हुई शुरुआत! हो रहे हैं ये भव्य आयोजन...

16 से 21 जनवरी तक चलने वाले इस उत्सव में दर्द आर्यों की संस्कृति को दिखाया गया है। इसमें उनकी जिंदगी से जुड़े विभिन्न पहलुओं को चित्रकला के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। साथ ही वहां के नृत्य, खान-पान और वेश-भूषा की प्रस्तुति भी की जा रही है।

राष्ट्रीय कला केंद्र द्वारा आयोजित इस उत्सव का एक विशेष आयोजन ‘प्रयागराज’ में होने जा रहा है। 20 जनवरी को आर्य घाटी से आए कलाकारों का एक दल प्रयागराज में अपनी संस्कृति की प्रस्तुति करेगा। यह कार्यक्रम दिल्ली संस्कृतिक मंत्रालय के कैंप ऑफिस, कला ग्राम मैं आयोजित होगा, जिसमें आर्य क्षेत्र ,लद्दाख से आए कलाकार अपने क्षेत्र के बारे में चर्चा करेंगे, नृत्य, गायन एवं वाचन यहां के मंच पर होगा। यह पहली बार इतिहास में होगा के लद्दाख के लोग कुंभ में सामूहिक तौर पर अपनी प्रस्तुति दर्ज करेंगे। यह अवसर आर्य लोगों के लिए महत्वपूर्ण तो है ही लेकिन समस्त देशवासियों एवं प्रयागराज में आए श्रद्धालु के लिए भी विशेष अवसर रहेगा।

इस समुदाय को IGNCA में लाने का श्रेय ‘वीरेंद्र बांगरू’ को जाता है. जिन्होंने इनके बीच जाकर इस संस्कृति के बारे में जानकारी एकत्रित की और IGNCA के माध्यम से पूरे देश और विश्व में फैलाने का प्रयास किया है.

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वीरेंद्र बांगरू

लद्दाख के दरद आर्यन

हिमालय क्षेत्र में कई जनजातियों का वास है जिन्होंने हजारों वर्षों से अपनी संस्कृति को संजोग के रखा है। इन्हीं घाटियों में ‘आर्य घाटी’ भी है जो पूरे विश्व में अपनी संस्कृति के लिए जानी जाती है।

लेह और कारगिल राज्यों के बीच में, सिंधु नदी के किनारे पर कुछ गांव फैले हुए हैं, जो की संसार में कुछ बुरे तो कुछ अच्छे कारणों के कारण प्रसिद्ध हैं। इस क्षेत्र की जनजातियों की विशिष्टता के ऊपर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, जिसके लिए इन जनजातियों को दुनिया में एक विशिष्ट जनजातियां में शामिल करने का विचार किया गया। कुछ विद्वानों ने इन
जनजातीय समुदायों को आर्यन लोगों में शामिल करने की कोशिश की, तो कुछ ने इनको एलेग्जेंडर का वंशज माना। बहरहाल, उनकी जो भी जातीयता है, ये तो सत्य है कि ये लोग उन समुदायों से कुछ हद तक तो अलग हैं जोकि पहले से ही लद्दाख के शीतमरुस्थलीय जगहों पर निवास कर रहे हैं।

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जनजातीय समुदायों मेंहम देखते हैं कि उनका पूरा इतिहास मौखिक तौर पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रेषित किया गया है। प्राथमिक तौर पर पहले से ही कुछ मजबूरियों की वजह से स्थानांतरण हुए हैं और परिणामस्वरूप नस्लीय बातचीत के कारण आपत्तिजनक स्थितियां उत्पन्न हो गईं,जिन्होंने आगे चलकर इनकी उत्पत्ति को और पेचीदा बना दिया। ‘दर्दों’ के मामले में जो कि लद्दाख में रह रहे हैं और कुछ गाँवों तक ही सीमित हैं और उनकी अपनी एक विशिष्ट जीवन शैली है जो कि इन सभी विचारों के अधीन है। इनकी उत्पत्ति पर और दूसरे पड़ौसी समुदायों जगहों से आत्मीयता से सम्बंधित अब तक कोई गंभीर वैज्ञानिक अध्ययन नहीं किया गया है। कुछ विशिष्ट वशेषताएं हैं जो कि इनको अपने द्रष्टिकोण और चरित्र से कुछ अलग बनाती हैं, जो कि निम्नलिखित हैं :-

1. आदमी और औरतें, दोनों ही अति सुन्दर वेशभूषायें और आभूषण पहनते हैं। सिर पर पहनने वाला साफा फूलों से सुशोभित होता है।
2. यह लोग गाय व मुर्गी पालन से घृणा करते हैं। गौ मांस प्रतिबंधित है।यह लोग केवल बकरी व भेड़ का दूध ही ग्रहण करते हैं।
3. ‘दरद’ घोड़ों को पालते हैं जिसे वे माल-परिवहन के लिए प्रयोग करते हैं।

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4. उनकी भाषा के 50% से अधिक शब्दों कीउत्पत्ति संस्कृत भाषा से हुई है।
5. सभी घरों कि रसोइयों में“सबदक” कि पूजा-अर्चना की जाती है जो कि एक प्रकार का लिंग है।यह लोग हर दिन सबदक के समक्ष दिन का बना पहला भोजन अर्पित करते हैं। सबदक त्रिकोणीय आकार में है।
6. कुछ समय पहले तक बहुपतित्व का पालन किया जाता था और उनमें पत्नियों कि अदला-बदली वाली प्रथा का भी प्रचलन था।
7. सार्वजनिक भावुक चुम्बन भी इस जनजाति में प्रसिद्ध है।
8. यहां के वासी फूलों से अत्याधिक प्रेम करते हैं और अपने शीर्ष को फूलों से सजाते हैं। यह फूल वह अपने घर के आस-पास लगाते हैं और देवताओं की पूजा भी फूलों से करते हैं। इन फूलों में एक विशेष फूल जिसका यहां की भाषा में मंटु टो कहते हैं, यह फूल 12 वर्षों तक मुरझाए बिना ताजा रहता है, इस फूल को देवताओं को समर्पित किया जाता है और अपने शीर्ष पर सजाया जाता है।
9. यहां के प्रमुख देवताओं में नारायण देवता और इंद्र देवता है।

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“दा, हनु, गरखुन व दारचिग्स”, जो कि आर्यन लोगों के गांव हैं, वह लेह से 160 किमी उत्तर- पश्चिम दिशा में स्थित हैं। कुछ गांव जो कि सिंधु नदी के दाईं ओर स्थित हैं ओर कुछ जो बाईं ओर हैं। इस जाति का बुद्ध धर्म की ओर रूपांतरण केवल 150 वर्ष पहले हुआ था। दरद लोग केवल अपने ही समुदाय में सम्बन्ध स्थापित करते हैं और जिसके परिणामस्वरूप, वह अपनी विशिष्ट पहचान को बचा पाने में सक्षम हुए हैं। यह तो कुछ समय पहले से प्रारम्भ हुआ है कि ये लोग लद्दाख के पड़ौसी समुदायों में घुलने-मिलने शुरू हुए हैं। वे आज भी ‘ब्रोकपा’ नाम से बुलाये जाते हैं। धा गांव एक पुरानी बस्ती है, जहाँ पुराने घरों के अवशेष अब भी देखे जा सकते हैं। जहाँ पर एक छत के नीचे 40 परिवार रहा करते थे। धा गांव में घरों की दीवारों का मलवा आज भी देखने को मिल सकता है। इस पुरानी बस्ती के निकट एक पुराना किला भी था जो कि बढ़ती हुई सेनाओं को रोकने के लिए बुर्ज के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। लेह से कारगिल तक की सड़कों का संपर्क खालसी के ज़रिये होता है।

सड़कों का परिवर्तन इस प्रकार है कि वह गांवों को जोड़ती हैं। कार्गिल युद्ध के पश्चात्, सरकार प्राधिकरण ने इस क्षेत्र के विकास हेतु कार्य किया। आर्यन घाटी के कुछ क्षेत्र बाहरी व्यक्तियों के लिए प्रतिबंधित हैं, जबसे पाकिस्तान कश्मीर पर कब्ज़ा करके इसकी सीमा से जुड़ा और भारतीय सेनाओं को इस क्षेत्र पर नज़र रखने के लिए तैनात किया गया है। आज के समय में गाँवों में सड़कों को एक दूसरे से जोड़ दिया गया है और यहाँ पर सार्वजानिक सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। धागांव में दो छोटे अतिथि-गृह हैं। सांस्कृतिक लक्षड़ों के उदाहरणों में बदलाव व धार्मिक प्रथाओं के कारण, जिसने बहुत से खतरों को जन्म दिया, जिसने इस समुदाय को अतिसंवेदनशील बना दिया। बुद्ध धर्म कुछ मुसलमान गाँवों को छोड़कर सभी गाँवों में अनुसरित किया जा रहा है। जैसे कि ये लोग बुद्ध धर्म का पालन करते हैं, ये लोग अपनी पुरानी परम्पराओं से दूर होते जा रहे हैं और अधिकतर अब दिन – प्रतिदिन के रिवाजों के लिए भिक्षुओं पर आश्रित हैं।

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दरदों की एक विशिष्ट जनजाति धा, हनु, गरखुन व दारचिग्स में ‘सिंधु नदी’ के चारों तरफ फैली हुई है। ये गांव लेह व कार्गिल जैसे दो औद्योगिक केंद्रों के बीच हैं। आर्यन गांव में रहने वाले लोग आर्यन कहे जाते हैं। आर्यन शब्द विदेशियों ने उनकी विशेषताओं जो कि उत्तर-भारतीय मैदानी क्षेत्रों, उनके देवी – देवताओं और उनकी भाषा के साधारण रिवाज़, जो कि 50% शब्दों से गठित हैं; तो, ये सभी कारक इनको इस सूखे – ठन्डे शुष्क क्षेत्र में एक अलग सभ्यता बनाते हैं। कोई भी लिखित गाइड या प्रलेखन इन निवासियों द्वारा नहीं लिखा गया। इनके लोकगीतों का समुद्र जो कि इनके मुद्दों व उनके त्यौहारों कि तारीखों को बयान करता है। बहरहाल, यह एक स्थापित तथ्य है कि ये लोग पड़ौसी क्षेत्रों से स्थानांतरित हुए और अंततया धा गांव में बस गए और बाद में पास के गांव में फैल गए और अपना लिया आवास बना लिया। जबसे गांवों की बसावट हर जगह फैली, धा गांव में किले के मलबे और आवासीय क्वार्टर भी हैं, जो की अब तितर-बितर हो गए हैं। स्थानीय लोकगीत के अनुसार, सभी परिवार एक छत्र-छाया में रहते थे, एक समय पर जो कि द्रढ़ और भली प्रकार संरक्षित थे। इस जनजाति का मुख्य पेशा भेड़ व बकरी पालन था। आज भी लद्दाखी लोग उनको ‘डोक्पा’ कहते हैं, जिसका अर्थ है -चरवाहे आबादी के लिहाज से यह शेत्र क्षेत्र बहुत बड़ा नहीं है यहां की आबादी 4000 के आसपास है, और कुछ ही गांव में फैली हुई है ज़िद में जिनमें हनु , घरखून और दारचिक प्रमुख है। यहां के गांव सिंधु नदी के किनारे पर बसे है। सीमा क्षेत्र होने के कारण यहां कुछ स्थानों पर जाना प्रतिबंध है यह सीमा पाकिस्तान से लगी हुई है.

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इन गांव के दूसरी ओर ‘पाकिस्तान अधिकृत गिलगित एवं बाल्टिस्तान’ का क्षेत्र आता है। लद्दाख क्षेत्र ठंडा मरुस्थल है, जहां सर्दियों में तापमान 0 शून्य से भी 15 से 20 डिग्री तक गिर जाता है, गर्मियां तो यहां थोड़ी ही समय के लिए होती है, और यही समय होता है यहां पर एक फसल तैयार हो जाए। जहां तक आर्य घाटी का क्षेत्र है, यहां हमें दूसरी जगहों के मुकाबले में थोड़ा मौसम अच्छा रहता है। यहां की जलवायु बी फल फूलों के लिए उपयुक्त है और रसीले खुबानी, अखरोट, सेब और अंगूर की पैदावार होती है।

उनके चहरे के हाव-भाव अर्थात विशेषताएं भी लद्दाख में रहने वाले लोगों से भिन्न हैं, वे अब लद्दाख क्षेत्र में अल्पसंख्यक रूप में रह गई हैं। आर्यन शब्द बहुत से विदेशी आगंतुकों जो कि इस गांव की यात्रा करते हैं, को आकर्षित करता है। उन्होनें बुद्ध धर्म का पालन केवल 100 या 50 वर्षों पूर्व ही शुरू किया है। इससे हले वह अपने देवी और देवताओं की ही पूजा करते थे, जिनमेंकि उन्हें आज भी विश्वास है और उनका निरंतर पालन कर रहे हैं। उनकी लोक-गाथाओं में इन्द्र, अग्नि, वरुण, आदि का उल्लेख है और उनकी लोक-गाथाएं हमें उनके इतिहास की गहराई में ले जाती हैं, जिसकी जांच-पढ़ताल की आगे और भी आवश्यकता है।

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इस उत्सव का एक विशेष आयोजन प्रयागराज में भी होने वाला है। 20 जनवरी को आर्य घाटी से आए कलाकारों का एक दल प्रयागराज में अपनी संस्कृति की प्रस्तुति करेंगें।

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