नई दिल्ली, 30 जनवरी 2019 : साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित किए जा रहे ‘साहित्योत्सव’ के तीसरे दिन लेखक सम्मिलन कार्यक्रम के तहत साहित्य अकादेमी पुरस्कार 2018 के विजेताओं ने पाठकों के सामने अपने लेखन के रचनात्मक अनुभवों को साझा किया।

"साहित्योत्सव" का तीसरा दिन : साहित्य अकादेमी सम्मान से पुरस्कृत लेखकों ने साझा किए अपने लेखन के ये रचनात्मक अनुभव..

डोगरी के लिए पुरस्कृत लेखक इन्दरजीत केसर ने कहा कि मेरे हर उपन्यास में आतंकवाद से होने वाले विनाश का उल्लेख है लेकिन सामान्यता मेरे अधिकतर उपन्यास नारी प्रधान है जिनमें नारी के मनोविज्ञान और मनोस्थिति के बारे में लिखा जाता है।

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लेखक इंदरजीत केसर (दाएं)

गुजराती के लिए पुरस्कृत शरीफा विजलीवाला ने कहा कि मेरे पिताजी अखबार बेचते थे इसलिए तरह-तरह की पत्रिकाएँ और किताबें पढ़ने को मिल जाती थीं। वहीं से पढ़ने की आदत हुई और इसी पढ़ने की आदत के कारण मैंने अनुवाद भी करना शुरू किया। पढ़ते समय मुझे जो कुछ भी अच्छा लगता मैं उसका गुजराती अनुवाद तुरंत करना चाहती थी। भारत विभाजन संबंधी साहित्य के नजदीक आने के बाद मैंने विभाजन से संबंधित सारा साहित्य पढ़ा और इनको पढ़कर ऐसा लगा कि इसके केंद्र में वह आम आदमी है जिसे हिंदुस्तान-पाकिस्तान, गुलामी-आजादी से कुछ लेना-देना नहीं था। फिर भी वही घर से बेघर हुआ, वतन से बेवतन हुआ और अपनी जड़ों से उखड गया।

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लेखिका शरीफा विजलीवाला (दाएं)

हिंदी के लिए पुरस्कृत चित्रा मुद्गल ने अपने वक्तव्य में कहा कि कुछ लेखकों की कुछ कृतियाँ उसके अपराध बोध की संतानें होती हैं। दरअसल ऐसी कृतियों के जन्म का स्रोत सृजनकार की अंतश्चेतना में अनायास, अनामंत्रित आसमाया, सदियों-सदियों से किया जा रहा वह अपराध होता है जो उसके वंशजों द्वारा किया गया होता है और उसी अपराध की विरासत को ढोता हुआ वह नहीं जानता कि समाज के कलंक को ढोने वाला, स्वयं के माथे पर उस कलंक को चिपकाए हुए जी रहा है। मैं यह स्वीकार करती हूँ कि पोस्ट बाॅक्स 203 नाला सोपारा लिख लेने के बाद भी मैं उस अपराध बोध से मुक्त नहीं हो पाई हूँ जिससे मुक्ति की कामना ने मुझसे यह उपन्यास लिखवाया।

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लेखिका चित्रा मुद्गल (दाएं)

मैथिली भाषा में पुरस्कृत लेखिका वीणा ठाकुर ने कहा कि मेरी पुरस्कृत रचना कहानी-संग्रह परिणीता समकालीन समाज, संस्कृति एवं मानवीय मूल्यों का ऐसा दस्तावेज है जिसमें आधुनिक जीवन-शैली का व्यापक और सटीक चित्रण किया गया है। इस कथा-संग्रह के अधिकांश पात्र मध्यम वर्गीय हैं तथा वर्तमान विषमताओं से उत्पन्न आक्रोश आर्थिक दुश्चिन्ता एवं सामाजिक नैतिकता से संबंधित समस्याओं के शिकार जान पड़ते हैं।

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लेखिका वीणा ठाकुर (दाएं)

राजस्थानी लेखक राजेश कुमार व्यास ने बताया कि कविता हमेशा एक नई दृष्टि देती है। यात्राएँ केवल भौगोलिक ही नहीं बल्कि अंतर्मन की भी होती है। बचपन के संस्कारों से मुझे पद रचना को प्रेरित किया और आगे चलकर यही मेरी अभिव्यक्ति का साधन बने।

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लेखक राजेश कुमार व्यास (दाएं)

संस्कृत लेखक रमाकांत शुक्ल ने बताया कि उनकी पुरस्कृत पुस्तक मम जननी एक काव्य संग्रह है और उसकी पहली कविता उन्होंने अपनी माँ के बारे में लिखी है। इस काव्य संग्रह में 25 कविताएँ सम्मिलित हैं जो सुनामी की भयंकरता भारत की विडंबनात्मक स्थिति आदि को प्रस्तुत करती है।

"साहित्योत्सव" का तीसरा दिन : साहित्य अकादेमी सम्मान से पुरस्कृत लेखकों ने साझा किए अपने लेखन के ये रचनात्मक अनुभव..
लेखक रमाकांत शुक्ल (दाएं)

अन्य पुरस्कृत लेखकों – सनन्त तांति, (असमिया), रितुराज बसुमतारी (बोडो), के.जी. नागराजप्प (कन्नड), मुश्ताक़ अहमद मुश्ताक़ (कश्मीरी), परेश नरेंद्र कामत (कोंकणी), एम. रमेशन नायर (मलयाळम्), बुधिचंद्र हैस्नांबा (मणिपुरी), मधुकर सुदाम पाटील (मराठी), लोकनाथ उपाध्याय चापागाईं (नेपाली), रमाकांत शुक्ल (संस्कृत), श्याम बेसरा (संताली), खीमन यू. मूलाणी (सिंधी), एस. रामकृष्णन (तमिऴ), कोलकलूरि इनाक् (तेलुगु) एवं रहमान अब्बास (उर्दू) ने भी अपने-अपने विचार श्रोताओं से साझा किए।

"साहित्योत्सव" का तीसरा दिन : साहित्य अकादेमी सम्मान से पुरस्कृत लेखकों ने साझा किए अपने लेखन के ये रचनात्मक अनुभव..

कार्यक्रम के अध्यक्ष साहित्य अकादेमी के उपाध्यक्ष माधव कौशिक ने अपने भाषण में कहा कि यह सभी लेखक हमारी भाषाई एकता और विचारों की ताकत के योद्धा हैं जो अपनी-अपनी तरह से अपनी-अपनी लड़ाईयाँ लड़ रहे हैं। कार्यक्रम का संचालन हिंदी संपादक अनुपम तिवारी ने किया।

पूर्वोत्तरी कार्यक्रम के अंतर्गत उत्तर-पूर्व और उत्तरी लेखक सम्मिलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन भाषण देते हुए प्रख्यात हिंदी कवि एवं समालोचक एवं साहित्य अकादेमी के पूर्व अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा आज का समय व्यापक हिंसा का समय है और मेरा यह विश्वास है कि अगर साहित्य को जनता तक पहुँचा दिया जाए तो यह हिंसा निश्चित रूप से कम होगी। साहित्य द्वारा परिवर्तन की आहिंसक प्रक्रिया संभव है। आगे उन्होंने कहा कि दुनिया की कोई भाषा न किसी से बड़ी होती है न किसी से छोटी। जिस परिवेश की भाषा होती है उस परिवेश का सबसे उपयुक्त चित्रण वही भाषा कर सकती है और उसका हू-ब-हू अनुवाद होना संभव नहीं है। भूमंडलीकरण के कारण एकरूपता का जो बुखार चढ़ा है उसमें कई भाषाएँ सत्ता और पावर की भाषाएँ हो गई है।

"साहित्योत्सव" का तीसरा दिन : साहित्य अकादेमी सम्मान से पुरस्कृत लेखकों ने साझा किए अपने लेखन के ये रचनात्मक अनुभव..

हम लेखकों को जागरूक होकर ऐसी चुनौतियों का सामना करना होगा, नहीं तो बहुत-सी भाषाएँ खत्म हो जाएँगी। विशिष्ट अतिथि ध्रुव ज्योति बोरा ने कहा कि यह समय झूठी खबरों का है और सत्य एक सत्य नहीं रहा है हर किसी का सत्य उसके लिए अलग-अलग है और इस कारण प्रेस और लेखकों आदि की स्वतंत्रता बाधित हुई है। लेखकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे एक सच्ची दुनिया को तैयार करे। कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष चंद्रशेखर कंबार ने की और स्वागत भाषण साहित्य अकादेमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने किया।

भाषांतर: अनुवाद की चुनौतियाँ एवं समाधान शीर्षक से हुई परिचर्चा में बीज वक्तव्य आशा देवी द्वारा दिया गया और इसमें विभिन्न भारतीय भाषाओं के अनुवादकों मिनी कृष्णन, आलोक गुप्त, पूरनचंद टंडन, गौरीशंकर रैणा, ओ.पी. झा, प्रकाश भातंब्रेकर, महेंद्र कुमार मिश्र, सुभाष नीरव, युमा वासुकि, जानकी प्रसाद शर्मा ने अपनी-अपनी भाषा की चुनौतियों और उनके समाधानों पर बातचीत की। इसी कार्यक्रम में प्रख्यात श्रीलंकाई लेखक सांतन अय्यातुरै को प्रेमचंद फ़ेलोशिप 2017 भी प्रदान की गई।

–सागर कुमार 

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