अच्छा हुआ कि सरकार ने फेक न्यूज़ पर सूचना-प्रसारण मंत्रालय की नई गाइलाइन वापस ले ली. वरना ऐसी गाइडलाइन याद दिलाती हैं कि सरकारें जब प्रेस से असुविधा महसूस करती हैं तो उसे दबाने के लिए किस तरह के हथियार तैयार करने की कोशिश करने लगती हैं. फेक न्यूज़ वाकई बहुत ही बुरी चीज़ है. इससे सरकारों पर जितना असर नहीं पड़ता, उससे ज़्यादा अख़बारों पर पड़ता है, मीडिया पर पड़ता है. आख़िर अखबारों और टीवी चैनलों की साख ही वह पूंजी है जो उनको लोगों के बीच प्रासंगिक बनाए रखती है. फेक न्यूज़ से सरकार से ज़्यादा मीडिया को डरना चाहिए.

लेकिन क्या अख़बारों या टीवी चैनलों में फ़ेक न्यूज़ या ग़लत ख़बरें रोकने का कोई इंतज़ाम नहीं है? क्या कोई और क़ानूनी तरीक़ा नहीं है जिससे इन्हें रोका जा सके? सच यह है कि अख़बारों के खिलाफ़ पहले ही कड़े कानून हैं. मीडिया कोई भी गलत ख़बर नहीं चला सकता. उसको माफ़ी मांगने से लेकर दंड भरने और जेल जाने तक की नौबत आ जाती है. अख़बार या चैनल माफ़ी न मांगें तो क्या हो सकता है- इसकी एकाधिक मिसालें अतीत में सुलभ हैं. छोटी-छोटी ग़लतियों पर अख़बारों-चैनलों को खंडन छापने-चलाने पड़ते हैं. जिसे छापे की भूल कहते हैं, जो टाइपिंग की ग़लतियां होती हैं, कभी अगर गफ़लत में ग़लत तस्वीरें लग जाती हैं- इन सब पर माफ़ी मांगने की नौबत आती है. कुछ साल पहले एक बड़े चैनल पर एक जज की गलत तस्वीर लग गई. ध्यान दिलाए जाने पर उसने तस्वीर हटा ली, लेकिन माफ़ी न मांगने की हेकड़ी दिखाई. इतने भर के लिए उस पर 100 करोड़ का जुर्माना ठोंक दिया गया. यह अनुभव हमारे लिए बहुत आम है कि मामूली सी चूक की वजह से जो ग़लत सूचना महज कुछ सेकंड के लिए ऑन एयर हुई, उस पर हमारा खेद-प्रकाशन दिन भर चलता रहा.

लेकिन माहौल कुछ ऐसा बनाया जा रहा है जैसे प्रेस और मीडिया बिल्कुल बेक़ाबू है. उसे रोकने का कोई क़ानून नहीं है. एक हद तक यह बात सच है कि मीडिया बेक़ाबू दिखाई पड़ता है. वह ख़बरों के नाम पर तमाशा करता नज़र आता है.  लेकिन यह क्यों संभव होता है? क्योंकि जब वह ख़बर न देकर तमाशा दिखा रहा होता है तो किसी को परेशानी नहीं होती. तब किसी को याद नहीं आता कि किसी चैनल को समाचार दिखाने का जो लाइसेंस मिला है, यह उसकी अवहेलना है, इस पर कार्रवाई होनी चाहिए. तब भी परेशानी नहीं होती जब मीडिया का कोई हिस्सा सरकार की महिमा के बखान में सोशल मीडिया में चल रहे फ़ेक न्यूज़ का प्रसारण करता है.  नोटबंदी के बाद एक टीवी चैनल ने 2000 रुपये के नए नोट की ऐसी ख़ूबियां बताईं कि यह नोट निकालने वाली एजेंसी सुपरमैन लगने लगी. बताया गया कि इस नोट में चिप लगा है जिसकी वजह से अब इसे छुपाया नहीं जा सकता. इस पूरी तरह झूठी और ग़ैरज़िम्मेदार ख़बर पर कार्रवाई तो दूर, कोई शिकायत तक नहीं हुई क्योंकि इस ख़बर का मक़सद सरकार के फ़ैसले की सराहना करना था.

परेशानी तब होती है जब मीडिया सरकारों को असुविधा में डालने वाली ख़बरें चलाता है, जब वह उसके निकम्मेपन, नाकारापन को उजागर करता है. तब सरकारें कांग्रेस की हों या बीजेपी की, यूपीए की हों या एनडीए की- मीडिया को नैतिकता सिखाने निकल पड़ती हैं. इसी तरह का दूसरा भ्रम यह फैलाया जाता है कि पत्रकार बड़े ताकतवर होते हैं. उनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता. यह भ्रम कहां से पैदा होता है? पत्रकारों और नेताओं के आपसी संपर्क से, तालमेल से. जब यह तालमेल टूटता है तो पत्रकार को कोई भी उसकी औकात बता देता है. ज़्यादा दिन नहीं हुए जब छत्तीसगढ़ की पुलिस दिल्ली आकर आधी रात के बाद एक संपादक रहे पत्रकार को उसके घर से उठा कर ऐसे मामले में जेल ले गई जिसमें उसका नाम तक नहीं था.  जरूरत पड़ने पर हवलदार से लेकर थानेदार और एसपी तक पत्रकार को पीट देते हैं और मंत्री-संतरी उसे अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते. जाहिर है, यहां भी कुछ पत्रकारों की हैसियत बनी-बची रहती है. जो लोग सरकारों के क़रीब होते हैं, उनके लिए पांच सितारा सुविधाएं होती हैं. लेकिन जो सरकारों के ख़िलाफ़ खड़े होते हैं, उन्हें दिन में सितारे दिखाए जा सकते हैं.

फ़ेक न्यूज़ पर सूचना प्रसारण मंत्रालय की गाइडलाइन और दिलचस्प थी. जिसने भी यह गाइडलाइन बनाई होगी, उसे मीडिया की कार्यप्रणाली का ज्ञान नहीं रहा होगा. वह जैसे मान कर चल रहा था कि कोई मान्यता प्राप्त रिपोर्टर जो ख़बर देता है, वह जस की तस अखबार या टीवी चैनल पर आ जाती है. आज के समय में ‘न्यूज़ गैदरिंग’- यानी खबर जुटाना हमेशा एक निजी नहीं, सामूहिक काम होता है. उसमें रिपोर्टर, कैमरापर्सन, एडिटर, रिसर्चर और कई दूसरी एजेंसियों की भी साझा भूमिका हो सकती है. सच तो यह है कि यह एक सांस्थानिक काम है. एक रिपोर्टर की पीठ पर एक संस्थान का हाथ होता है. लेकिन सूचना प्रसारण मंत्रालय की गाइडलाइन इस मायने में ख़तरनाक थी कि पहली बार वह संस्थान की जगह व्यक्ति को फ़ेक न्यूज़ के लिए ज़िम्मेदार बता रही थी. यानी किसी गलत ख़बर पर संस्थान का कुछ नहीं बिगड़ेगा, पत्रकार की मान्यता रद्द हो जाएगी.

अब फ़ेक न्यूज़ के सवाल पर लौटें. हाल के दिनों में कितने फ़ेक न्यूज़ हैं जो मान्यता प्राप्त पत्रकारों या संस्थानों ने चलाए? सरकार की बिलकुल ताज़ा शिकायत है कि यह ग़लत ख़बर फैलाई जा रही है कि सरकार दलितों का आरक्षण ख़त्म करने जा रही है. लेकिन क्या किसी टीवी चैनल या अख़बार या पत्रकार ने यह ख़बर किसी रूप में चलाई? यह ख़बर अगर कहीं चली होगी तो वह सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर चली होगी. फेसबुक और ट्विटर पर दिखने वाली फ़र्ज़ी आइडीज़ से चलाई गई होगी. सरकार को रोकना है तो इन्हें रोकने की कोशिश करनी चाहिए.

लेकिन उल्टा यह दिखता है कि सरकार ऐसी ग़लत ख़बरें फैलाने वाले, नफ़रत भरे बयानों को बढ़ावा देने वाले लोगों के प्रति सदय रही है. कुछ अरसा पहले जब लोगों ने यह ध्यान खींचा कि पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या को जो लोग जायज़ ठहरा रहे हैं, उनमें से कुछ लोगों को प्रधानमंत्री भी फॉलो करते हैं तब सरकार की ओर से बहुत लचर सफाई आई. वाट्सऐप पर अफ़वाहों की बिल्कुल खेती चलती है- और अगर कोई भरोसेमंद सर्वेक्षण हो तो यह साफ़ दिखेगा कि इस अफ़वाहबाज़ी में बहुत सारे ऐसे लोग शामिल हैं जो प्रधानमंत्री और सरकार के समर्थक हैं. ‘रिपोर्टर्स विदाउट बोर्डर्स’ नाम की एक संस्था ने प्रेस की आज़ादी का जो वैश्विक सूचकांक बनाया है, उसमें भारत 136वें नंबर पर है. फिलीस्तीन और अल्जीरिया से नीचे, बेशक पाकिस्तान से दो अंक आगे. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में प्रेस की यह हैसियत बताती हैं कि सरकारें उससे कितनी असुविधा महसूस करती हैं.

वैसे भी भारत में अभिव्यक्ति की जो आज़ादी है, वह किन्हीं सरकारों की दी हुई नहीं है. वह आज़ादी की लड़ाई की कोख से पैदा हुए उन मूल्यों में से एक है जिन्हें भारतीय समाज ने बनाया है और जिन्होंने भारतीय समाज को बनाया है. यह बात अक्सर कुछ उलाहने के साथ कही जाती है कि भारत में ही प्रेस सरकारों की इस तरह आलोचना कर सकता है. चीन और पाकिस्तान यह आज़ादी नहीं देते. लेकिन इस उलाहने में यह बात छुपा ली जाती है कि सरकारें इस आज़ादी को छीनने की कोशिश करती हैं, जनता इसे हासिल कर लेती है. दरअसल जनता का यही डर रहा होगा कि सूचना प्रसारण मंत्रालय की गाइडलाइन पर सरकार ने पांव खींचने में देरी नहीं की. 1984 में 400 से ज़्यादा सीटें लाने वाले राजीव गांधी महज चार साल बाद काला प्रेस बिल लाना चाहते थे- जाहिर है, प्रेस में अपनी अलोकप्रियता उन्हें डराने लगी थी. यह अनायास नहीं है कि सूचना प्रसारण मंत्रालय को फेक न्यूज़ रोकने का यह खयाल तब आया जब अचानक बहुत सी ख़बरें सरकारी क़दमों के ख़िलाफ़ पड़ने लगी हैं.

हालांकि गाइडलाइन भले टल गई हो, पत्रकारिता पर खतरा टला नहीं है. यह ख़तरा दोतरफ़ा है. वाकई फ़ेक न्यूज़ की एजेंसी चला रहे ग़ैरज़िम्मेदार तत्वों और राजनीतिक दलों के समर्थकों से लेकर तरह-तरह के मुनाफ़ेबाज़ कारोबारी इस कोशिश में हैं कि फ़ेक न्यूज असली न्यूज़ की जगह ले ले. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव के बाद हुए एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई कि वहां सोशल मीडिया पर सच से ज़्यादा झूठ चला. यह झूठ सबसे ज़्यादा बार रिट्वीट किया गया कि पोप ने ट्रंप को समर्थन दे डाला है. जाहिर है, इसका अगर खंडन हुआ हो तो उसे उतनी जगह नहीं मिली.

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